संस्कृत सप्ताह का समापन

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Closing of sanskrit week

आज निरमंड में संस्कृत सप्ताह का समापन हो गया। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिला रामपुर के जिला कार्यवाही चन्द्र कान्त शर्मा, विशिष्ट अतिथि के रूप में हिमाचल शिक्षा समिति शिमला सह संगठन मंत्री व जिला के अध्यक्ष भोगेश्वर शर्मा, कार्यक्रम के अध्यक्ष के रूप में विद्या मंदिर के प्रबंधन समिति के अध्यक्ष खोमा नंद शर्मा व मुख्य अध्यापक राकेश कुमार शर्मा की उपस्थिति में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि महोदय व अन्य अतिथियों ने द्वीप प्रज्जवलित करके किया। आचार्या सुनिता ने मुख्य अतिथि महोदय को टोपी, मफलर व बैज लगाकर सम्मानित किया। आचार्या कुसुम ने विशिष्ट अतिथि महोदय को टोपी, मफलर व बैज लगाकर संमानित किया। आचार्या अनिता ने कार्यक्रम के अध्यक्ष महोदय को टोपी, मफलर व बैज लगाकर संमानित किया। आचार्य पुष्पा को बैज लगाकर संमानित किया। मुख्य अतिथि महोदय व अन्य अतिथियों का परिचय व संस्कृत ध्येय मंत्र का उच्चारण आचार्य रुप कमल शुक्ला ने करवाया। मुख्य अतिथि महोदय व अन्य अतिथियों का स्वागत मुख्य अध्यापक राकेश कुमार ने किया। यामिनी दीदी अन्य ने मुख्य अतिथि महोदय व अन्य अतिथियों के स्वागत में स्वागत गीत प्रस्तुत किया। इस समापन समारोह में वर्गश: संस्कृत प्रश्न मंच प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया। प्रत्युष भैया ने संस्कृत गीत प्रस्तुत किया। विशिष्ट अतिथि भोगेश्वर शर्मा जी ने अपने उद्बोधन में कहा की संस्कृत सप्ताह का आयोजन सबसे पहले 1969 में किया गया। विश्व में 6000 से अधिक भाषा कही जाती है उन सभी भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा है। इसी भाषा के अन्तर्गत पांडुलिपि का अविष्कार हुआ।

कार्यक्रम के संयोजक व विद्या मंदिर निरमण्ड के संस्कृत आचार्य रुप कमल शुक्ला ने अपने उद्बोधन में कहा प्राचीन काल में संस्कृत भाषा जन भाषा थी। यह भाषा पूर्णतः वैज्ञानिक भाषा है। इस बात पुष्टि स्वयं परमाणु बम के जनक राबर्ट जे0 ओपेन हाईमर ने 16-07-1945 को अपने प्रथम आभियांत्रिकी परिक्षण ट्रीनिटी न्यू मेक्सिको में कहा कि यदि हजारों सूर्य की चमक धरती पर झोंके तो संम्पूर्ण विश्व का विश्व का विनाश संभव है और अंत में उन्होंने ने कहा कि जे0 राबर्ट जिस श्लोक से प्रभावित हुए वह श्लोक श्री मद्भभागवतगीता का श्लोक हैं। वह ही श्रीमद्भगवत गीता जो भारतीय संस्कृति का पवित्र ग्रंथ है। और आप लोग कहते हैं संस्कृत के ज्ञाता है वो प्राचीन है। हाँ मैं प्राचीन हूँ। क्योंकि मुझे अपनी प्राचीनता पर गर्व है। भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, गणित शास्त्र इत्यादि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। मुख्य अतिथि महोदय चंद्र कान्त शर्मा ने कहा कि केवल वर्ष में एक बार संस्कृत सप्ताह मना कर संस्कृत भाषा का पुनर्जन्म नहीं हो सकता है। हम इस का प्रयोग दैनिक व्यवहार में भी करना चाहिए। यह भाषा आत्मीय भाषा। हम इसका प्रयोग व प्रचार प्रसार अधिक से अधिक करना चाहिए। पूरे विश्व में सबसे गरीब भाषा आंग्ल भाषा है। हमें अपनी संस्कृति के पुनर्जन्म के लिए सबसे पहले संस्कृत भाषा का पुनर्जन्म करना होगा। तभी भारत देश विश्व गुरु के स्थान को पुनः प्राप्त करने में समर्थ होगा। अंत में इस सहरानीय कार्य के लिए उन्होंने संपूर्ण विद्या मंदिर परिवार का आभार व्यक्त किया।


मुख्य अतिथि महोदय व अन्य अतिथियों ने इस सप्ताहिक कार्य क्रम में प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले भैया एवं दीदीयों को सम्मानित भी किया। अंत में कार्यक्रम अध्यक्ष महोदय ने मुख्य अतिथि महोदय व विशिष्ट अतिथि महोदय के प्रति संपूर्ण विद्या मंदिर परिवार की ओर धन्यवाद किया। कार्यक्रम में मंच संचालन दशम कक्षा की यामिनी दीदी, सुनिधि दीदी व आचार्य रुप कमल शुक्ला जी ने किया।


यह जानकारी विद्या मंदिर निरमण्ड के मीडिया प्रभारी व संस्कृति इस कार्यक्रम के संयोजक आचार्य रुप कमल शुक्ला जी ने दी।